युवा दिमाग क्यों हो रहे हैं अधिक संवेदनशील?बच्चों के संज्ञानात्मक विकास पर बढ़ते स्क्रीन टाइम का प्रभाव

पटना। जेपी न्यूज़। डिजिटल युग में आज हर चीज़ एक क्लिक की दूरी पर है। स्मार्टफोन और डिजिटल तकनीक ने दुनिया को हमारी उंगलियों तक पहुंचा दिया है। जहां एक ओर यह सीखने और आपसी जुड़ाव के बेहतरीन साधन हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों में डिजिटल ओवरइंडल्जेंस (अत्यधिक स्क्रीन उपयोग) उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे का मस्तिष्क अभी निर्माण की प्रक्रिया में होता है। लगभग 20 वर्ष की आयु तक मस्तिष्क में न्यूरोप्लास्टिसिटी की प्रक्रिया चलती रहती है, जिसमें बाहरी उत्तेजनाओं के आधार पर न्यूरॉन्स आपस में जुड़ते और फिर से व्यवस्थित होते हैं। जब बच्चा लंबे समय तक मोबाइल या टैबलेट पर समय बिताता है, तो उसका मस्तिष्क तेज़ गति और अधिक डोपामिन वाले वातावरण का आदी हो जाता है।
मोबाइल ऐप्स और गेम्स को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि हर नोटिफिकेशन, लाइक या रिवॉर्ड पर डोपामिन रिलीज़ हो—ठीक उसी सिद्धांत पर जिस पर जुए की मशीनें काम करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चों को पढ़ना, खेलना या वास्तविक जीवन की गतिविधियाँ उबाऊ लगने लगती हैं। लगातार ऐप बदलने की आदत मस्तिष्क को कम ध्यान अवधि (Short Attention Span) के लिए प्रशिक्षित करती है।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में आंतरिक नियंत्रण (Internal Brake) के विकास को भी प्रभावित करता है, जिससे चिड़चिड़ापन, गुस्सा और भावनात्मक असंतुलन बढ़ सकता है। इसके अलावा, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (ब्लू लाइट) मेलाटोनिन हार्मोन को दबा देती है, जिससे नींद में देरी, खराब नींद और याददाश्त पर असर पड़ता है।


लगातार बाहरी उत्तेजना बच्चों की कल्पनाशीलता और आत्मचिंतन की क्षमता को भी सीमित कर देती है। आज कई बच्चे अपने खाली समय में रचनात्मक गतिविधियों की बजाय मोबाइल पर मनोरंजन को प्राथमिकता देने लगे हैं, जिससे रचनात्मकता में कमी देखी जा रही है।
इस लेख के माध्यम से माता-पिता को यही संदेश दिया गया है कि वे बच्चों के मोबाइल उपयोग को लेकर सजग रहें। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्चे मोबाइल का सीमित और सकारात्मक उपयोग करें। समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया तो इसका प्रभाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकाल में गंभीर हो सकता है।
तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि उसका संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग ही बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास की कुंजी है।

लेखिका – अनुराधा